why-azam-is-disturbed-from-law-on-talaq_azam-khan-300x200डिवोर्स या तलाक़ हर हाल में सिर्फ औरत की ज़िन्दगी भर की हार का दूसरा नाम है। चाहे वो औरत किसी भी धर्म,जात या समाज से ताल्लुक रखती हो। तीन तलाक़ पर कानून से क्यूं हैं आज़म परेशान? अगर उन्हें अपनी वाली छोड़नी है अभी छोड़ दें, कानून आने के बाद तलाक़ देना काफी महंगा साबित हो सकता है। वैसे भी शादी की अहमियत धीरे-धीरे समाज से ख़त्म हो रही है, छोटी-छोटी बातों पर डिवोर्स वैसे भी आजकल आम बात है। आज़म खान यूं भी वक़्त पर कहीं नही पहुंच पाते, सत्ता में रहे तो अपने कार्यालय पर नही पहुंच सके और न ही हाईकोर्ट की पेशी के वक़्त का उनको ख़्याल रहा। इसके लिए अपनी बीवी को ज़िम्मेदार ठहरा कर तलाक़ देकर दोबारा आज़ादी से जी सकते हैं…और अगर ऐसा नही है तो आज़म ख़ान जैसे शरीयत के ठेकेदारों को अपनी ही क़ौम की औरतों से इतनी नफरत क्यूं है?

why-azam-is-disturbed-from-law-on-talaq_talaaq-300x183क्या औरतों के नाम पर हमदर्दी का एक भी शब्द उनकी ज़हरीली ज़बान से नही फूटता। क्या बुराई है अगर एक औरत अपनी बसी-बसाई गृहस्थी को बचाना चाहती है? क्यूं उसे तलवार की धार पर चलने को मजबूर करके, उस दिन तक रूके रहना जब तक बेटी तलाक़ लेकर मेहर की रकम के साथ घर नही लौट आती। इसे शरीयत का कानून कहें या उसकी आड़ में किया जाने वाला शादी के नाम का धन्धा? तलाक़ बाद एक औरत की मानसिक स्थिति कैसी हो जाती है इसके बारे में तो सिर्फ औरत ही बता सकती है जिस पर ऐसी बीती हो। तलाक़ का मज़ाक बनाते ये लोग अपनी ही बहन बेटियों के दुश्मन हैं, घर लौट कर आई तलाक़शुदा जवान बेटी को ज़्यादा दिन घर बिठा कर रखने का मतलब जब मायके वालों को समझ नही आता तो उसे दूसरी शादी के लिए तैयार किया जाता है बगै़र इस गारंटी के कि उसे दोबारा बेवफाई नही झेलनी पडे़गी, मतलब हर हाल में हार उस औरत की ही होती है जिसे नाइंसाफी का शिकार बनाया जाता है। ऐसे में बड़बोले नेता मंत्रियों को अपनी ज़बान पर लगाम लगा कर बैठना चाहिए क्यूंकि वो किसी भी औरत की ज़िन्दगी का फैसला करने का कोई अधिकार नही रखते, ये सिर्फ औरत तय करेगी कि उसके साथ शादी के नाम पर किया जाने वाला तलाक़ का कारोबार उचित है या नही?

ऋतु कृष्णा

Ritu Krishna

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