this-alliance-will-be-house-on-fire_300x158सबसे बड़ा प्रश्न अगर मोदी विरोधी महागठबन्धन बन भी गया तो कौन होगा नेता? गठबंधन तो दूर की बात पहले सारे राजनीतिक दलों के बड़े नेता जो बरसों से प्रधान कुर्सी की आस में एक पैर कब्र में एक पांव कुर्सी पर धरे प्रतीक्षा कर रहे हैं उनमें से कौन अपने सपनों की कुर्बानी देगा? मायावती? नितीश कुमार? अजीत सिंह? ममता बनर्जी? या फिर कोई और? जिनके पास अब पांच वर्ष तक प्रतीक्षा करने का धैर्य नही बचा वो मौका मिलने पर कभी भी अपनी शर्तें मनवाने से बाज़ नही आएंगे। जीत भी गए तो भी मल्टीग्रेन सरकार को पचा पाना देश की जनता के लिए बेहद मुश्किल साबित होने वाला है। अभी तो द्राविण क्षेत्र की बात भी नही हुई? द्रमुक और अन्ना द्रमुक कभी भी साथ नही आएंगे, न ही मां माटी मानुष के नाम पर बंगाल का सत्यानाश कर रहीं ममता दीदी कम्यूनिस्टों से हाथ मिलाएंगी। इसी बीच मायावती अपने मूल स्वभाव आड़े वक़्त पे धोखा देना के लिए बेहद प्रसिद्ध हैं, अपनी ज़िद के लिए प्रसिद्ध नितीश कुमार कभी भी ढीठ व्यक्तित्व लालू यादव संग बैठ कर चाय नही पीना चाहेंगे, कभी भी संतुष्ट न हो पाने की प्रवृत्ति के स्वामी अजीत सिंह भी अड़ियल रवैये के लिए जाने जाते हैं। इन सबको साथ आने के लिए मना भी लिया गया फिर भी इस महागठबंधन के सिर पर आरामशीन हमेशा चालू स्थिति में झूलती रहेगी। ये ऐसा लाख का घर सिद्ध होगा जिससे निकालने को इस बार विदुर कोई चूहा नही भेज सकेंगे, आपसी मनमुटाव की एक चिंगारी काफी होगी इस एन्टी मोदी-भाजपा गठबंधन को मिट्टी में मिलाने के लिए।
एकता जिसकी कभी भी किसी भी राजनीतिक दल ने बात नही की, जिसको लेकर कभी भी किसी भी सत्ताधारी पार्टी ने कोई अभियान नही चलाया, उसी अनेकता में एकता की सबसे ज़्यादा ज़रूरत इन राजनीतिक दलों को पड़ेगी, आग और मोम के खेल का शुरूआती नज़ारा अखिलेश-मायावती की शक्ल लेकर उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में दिखने लगा है। जितना ज़ज़्बा मोदी को हराने का पाला है उसका एक चौथाई देश सेवा का दिखा दिया होता तो दुश्मनों के तलवे चाटने की नौबत ही नही आती!

ऋतु कृष्णा

Ritu Krishna

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