bureaucratic_thugs-300x151घोटाले, हेर-फेर और सबूत मिटाने की तरक़ीबें क्या आईएएस-पीसीएस के पाठ्यक्रम का अनिवार्य अंग होता है? सरकारी अफसर भ्रष्ट होते हैं अथवा सम्पूर्ण सरकारी तंत्र ही भ्रष्ट है कि इनमें शामिल होते ही हर अधिकारी को भ्रष्टाचार छूत की बीमारी की तरह घेर लेता है। सीधा काम हो, मामूली अर्ज़ी देनी हो अथवा किसी विभाग से कोई सामान्य एवं न्यायोचित मंज़ूरी लेनी हो, नीचे से ऊपर तक हर अधिकारी को पैसा खिलाना एक नियम बन गया है। इस बार सरकार सबसे पहले अपने ही अफसरों के सिर पर चढ़ कर नाच रही है, देखते हैं आने वाला समय कुछ बदलाव लेकर आयेगा या फिर ब्लैक होल और बड़ा हो जाएगा…। पेट न हुआ ब्लैक होल हो गया, ऐसी भूख जो कभी ख़त्म ही नही होती। ये प्राणी जन्म से भुख्खड़ नही होते पर पता नही कैसे ब्यूरोक्रेट शब्द से जुड़ते ही इनकी भूख वासना की चरम सीमा को भी लांघ जाती है। सरकारी अफसर बनते ही पेट बड़ा हो जाता है। इनकी और इनके परिवार की लालसाएं थाह नही पातीं, जो परिवार कभी एक कमरे में रहा हो, सीमित रोटी दाल जैसे भोजन से पेट भरा हो, उस परिवार को 10 कमरों के बंगले में भी घुटन ही महसूस होती है फिर उस घुटन से ताज़ा हवा लेने के लिए विदेश यात्राएं भी आवश्यक हो जाती हैं। रोटी दाल वही होती है बस स्टील की आड़ी पिचकी कटोरियों की जगह विदेशी क्रिस्टल कटलरी ले लेती है। हराम की कहिए या मुफ्त की, सेवाएं लेने की ऐसी आदत पड़ जाती है कि जेब से एक रूपया भी निकालना मुश्किल हो जाता है, ऐसे सरकारी अधिकारियों के यहां कार्यरत मामूली माली, रसोईया, गार्ड, चपरासी, मज़दूर और सफाई कर्मचारी हमेशा सही समय पर वेतन के लिए बिलखते ही नज़र आते हैं। वे चोरी से अपना खर्च निकाल लें तो ठीक अन्यथा ईमानदारी से काम करने की स्थिति में हमेशा निराशा ही हाथ लगती है। जिन्हें स्वयं बेईमानी का चस्का लग चुका हो उन्हें संभवतः ईमानदारों से एक प्रकार की घृणा होने लगती है। इन्हें तलाश रहती है जुगाड़ी और तीन-पांच की तिकड़म जानने वाले लोगों की, जो वक़्त बेवक़्त इन्हें ऊपर की कमाई के रास्ते सुझाते रहें। इस प्रकार की मानसिकता के चलते इनसे किसी तरह की सहानुभूति सेवा अथवा सहृदयता की आशा रखना मूर्खता नही तो और क्या है?

ऋतु कृष्णा

Ritu Krishna

Related Posts

Create Account



Log In Your Account