end-of-naxalism-after-demonetization-a-lie-6_300x225प्रश्न तो जस का तस बना हुआ, नक्सलवाद कम होने कि जगह दिनों दिन बढ़ता ही क्यूं जा रहा है? वर्षों से नक्सलवाद माओवाद का सफाया करने की बात करने वाली सरकारें आज की तारीख़ तक असफल ही रही हैं। दमन का हिंसात्मक और बौद्धिक दोनों तरह के प्रयास बड़े ज़ोर शोर से किए जाते रहे, यहां तक कि नोटबंदी की कार्यवाही भी आंशिक रूप से ही इन्हें नुकसान पहुंचा सके हैं किन्तु क्या इतने से इन नक्सलियों माओदस्युओं की कमर तोड़ी जा सकेगी? और शारीरिक अथवा मानसिक क्षति पहुंचने से क्या इन गुटों का सफाया हो जाएगा जिनकी जड़े 1967 से लेकर अब तक न जाने कितनी गहरी हो चुकी हैं। उल्टे कभी अलग अलग काम करने वाले नक्सलवादी और माओवादी अब लगभग एक हो चुके हैं, इनके उद्देश्य भी मिलते जुलते हैं और काम करने का तरीका भी, प्रधानमंत्री के दावों के उलट ये नक्सली अब नोटबंदी से प्रभावित होकर बैंक और एटीएम हमले पर भी उतारू हो गए हैं। इस सब का नतीजा केवल खू़न ख़राबे पर आकर ख़त्म होगा। देश में आज भी वो कारण वो मुद्दे स्थाई रूप से फन काढ़े बैठे हैं जिनके चलते नक्सलबाड़ी से कम्यूनिस्ट आंदोलन का लाल सलाम आज लाल रक़्त में परिवर्तित हो चुका है। उन वजहों पर क्यूं ख़ामोश पड़ी रहीं सरकारें? ‘‘समरथ को नही दोष गुसाईं‘‘ के ढर्रे पर रगड़ रही सरकारी गाड़ी को बीच पटरी पर खड़े ग़रीब गु़रबा क्यूं नही दिखते? अपनी वाह-वाही के हरे चश्में से सब हरा ही दिखता होगा पर यहां भारत माता के गर्भ का एक हिस्सा किसी चश्में के कारण नही वरन्
रक़्त से लाल हुआ जाता है। खेल नही है नक्सलवाद पर लगाम लगाने की मुहिम पर कम से कम एक ज़ोरदार शुरूआत की उम्मीद तो अपनी सरकारों से हम कर ही सकते हैं। जो भी वो नक्सलवादी या माओवादी हैं तो सब केवल भटके हुए भारत के युवा या यूं कहें कि वे भी भारत हैं!

ऋतु कृष्णा

Ritu Krishna

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