नारी सम्मान में व्यवधान क्यूं?

मां-बहन के बाद किसी भी अन्य स्त्री को सम्मान देने में इतनी दुविधा? आत्मरक्षा, अस्तित्व रक्षा, चरित्र रक्षा बस यही कुछ रह गया है एक औरत के आंचल में। विधवा विवाह, बाल विवाह, दहेज प्रथा, तीन तलाक़ और न जाने कितने की भेदभाव के दंश चुभे हैं, जो पीड़ा बढ़ाते जा रहे हैं, इस पीड़ा की औषधि किसी धर्म, जाति के ठेकेदार के पास नही है किसी राजनीतिक पार्टी का ये मुद्दा नही बन सकता, कोई भी राजनीतिज्ञ, वर्तमान नेता या मंत्री, स्त्री पक्ष से जुड़े मुद्दे को अपना वोट बैंक नष्ट नही करने दे सकता। फिर किस काम के राष्ट्रपिता, राष्ट्र ऋषि, युग पुरूष, विकास पुरूष ये नाम केवल स्त्री शक्ति पर अपने वर्चस्व को बनाए रखने का ढोंग नही तो और क्या है? नारी के साथ लगातार उसका भविष्य छल कर रहा है, सरकार किसी की भी हो राज-पाट कोई भी चलाए, परिस्थितियां कभी भी पक्ष नही लेतीं, धर्म, जाति, समाज, परिवार ये सारे शब्द केवल पुरूषों के लिए ही बनाए गए हैं अतः उन्हीं के सहायक भी हैं किन्तु नारी की समस्याएं सुलझाने में स्वयं एक नारी भी पुरूष प्रधान जाल में उलझ कर रह जाती है। असल में समस्याओं को आधार बनाकर ही नारी के आकार प्रकार की कल्पना की गई होगी। सिकुड़न और लकीरों से मुक्त माथा जहां शादी से पहले रंगबिरंगी बिन्दी और शादी के बाद लाल सिंदूरी बिन्दी शोभती है उसके पीछे एक कोमल विचार भी है जिसे हर कोई अपनी सुविधानुसार ढालता बदलता जाता है। उसी में कहीं उसका भाग्य भी छिप

कातिलों से न्याय की मांग…

हाल ही में खुलासा हुआ कि पाकिस्तान के नए सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा ने ही अपने आतंकी सैनिकों को भारतीय सेना शहीदों के सर काटने का आदेश दिया था, बाजवा के तेवर अब भाजपा सरकार को सीधी चुनौती दे रहे हैं। कपिल सिब्बल जैसे लोग मोदी को चूड़िया भिजवाने की बात कह रहे हैं और जवाब में वैंकया नायडू कड़ी निंदा के अलावा और कुछ नही कहते, भाजपा की सुरक्षा नीतियां अब कमज़ोर दिखने लगी हैं, सेना ही अपने दम पर पड़ोसियों के कुकर्मों का प्रतिउत्तर दे रही है। सर्जिकल स्ट्राईक का असर भी ख़त्म ही हो चुका है, पाक सेना की ओर से सर्जिकल स्ट्राईक का जवाब भी आया कि,‘‘हमने सर्जिकल स्ट्राईक की तो भारत की नस्लें याद रखेंगी’’ गीदड़ भभकी ही सही पर रीढ़ में यह अदभुत साहस पाकिस्तान को कहीं न कहीं से निर्बाध मिल रहा है, चीन-पाकिस्तान का मेल इस साहस का बड़ा साक्ष्य है, अरूणाचल के कई हिस्सों को चीनी नाम देने के बाद, चीन अब अपने हितों की रक्षा का मुद्दा लेकर कश्मीर मसले पर भारत-पाक के बीच आ रहा है। पाकिस्तान जैसे बेसहारा, दिशाहीन देश के लिए चीन की कच्ची दीवार की टेक लगाने को काफी है। जब भी पाकिस्तान की बात होती है विभाजन का घाव टीस देने लगता है हृदय-मन दोनों विचलित हो उठते हैं, खुला घाव जिसे लगातार हो रहे घुसपैठों ने भरने ही नही दिया, वह इन दिनों जलन पैदा कर रहा है, शरीर का कटा हुआ हिस्सा अब सड़ांध उत्पन्न करने लगा है। वर्षों तक इसे साफ

एक तो चोरी, ऊपर से सीनाज़ोरी

विगत कई वर्षों से प्रदेश में लूटपाट कर रहे पेट्रोल पम्पों के खिलाफ जब प्रशासन ने कार्यवाही करने का काम प्रारम्भ किया तब पेट्रोल पंप एसोसिएशन ने लखनऊ में हड़ताल कर यह साबित कर दिया है कि चोर चोर मौसेरे भाई ही होते हैं। बीते कुछ दिनों में लखनऊ के कुछ पेट्रोल पम्पों पर STF ने रेड डाली जिसमे 7 पेट्रोल पम्पों को तेल चोरी के आरोप में सीज़ कर दिया गया है। इसके बाद सरकार ने अपनी इस मुहिम को आगे बढाते हुए जांच को और अधिक तेज़ी से बढ़ाने का विचार किया जिससे भयभीत होकर भ्रष्ट पेट्रोल पंप संचालकों ने हड़ताल कर दी है। लखनऊ पेट्रोल पंप एसोसिएशन की हड़ताल को देखते हुए यह कहना भी गलत नहीं होगा कि एक नहीं बल्कि सब के सब भ्रष्टाचार रूपी कीचड़ से सने हुए हैं। प्रदेश सरकार से अनुरोध है कि अपनी इस मुहिम में और तीव्रता लाएं और जो पेट्रोल पंप हड़ताल करने में जुटे रहते हैं उन सबके लाइसेंस रद्द करे।

नक्सलवाद पर हावी होने का असफल प्रयास

सरकार की रणनीति पर ही प्रश्नचिन्ह लगा है क्यूंकि सरकार नक्यलवाद पर हावी होकर अपनी वाह-वाही बटोरना चाहती है, काबू पाने के उनके सारे तरीके असफल सिद्ध हुए हैं। नक्सलवाद के मामले में सरकार ने केवल झूठे दावे ही किए, नोटबंदी से नक्सलवाद को नुकसान बड़ा झूठ, उल्टे नक्सलियों को जंगल से बाहर आकर बैंक, एटीएम और अन्य जगहों पर डकैतियां डालने को उकसाने का काम किया गया है। वर्षों से नक्सलवाद माओवाद का सफाया करने की बात करने वाली सरकारें आज की तारीख़ तक असफल ही रही हैं। दमन का हिंसात्मक और बौद्धिक दोनों तरह के प्रयास बड़े ज़ोर शोर से किए जाते रहे, यहां तक कि नोटबंदी की कार्यवाही भी आंशिक रूप से ही इन्हें नुकसान पहुंचा सके हैं किन्तु क्या इतने से इन नक्सलियों माओदस्युओं की कमर तोड़ी जा सकेगी? और शारीरिक अथवा मानसिक क्षति पहुंचने से क्या इन गुटों का सफाया हो जाएगा जिनकी जड़े 1967 से लेकर अब तक न जाने कितनी गहरी हो चुकी हैं। उल्टे कभी अलग अलग काम करने वाले नक्सलवादी और माओवादी अब लगभग एक हो चुके हैं, इनके उद्देश्य भी मिलते जुलते हैं और काम करने का तरीका भी, प्रधानमंत्री के दावों के उलट ये नक्सली अब नोटबंदी से प्रभावित होकर बैंक और एटीएम हमले पर भी उतारू हो गए हैं। इस सब का नतीजा केवल खू़न ख़राबे पर आकर ख़त्म होगा। देश में आज भी वो कारण वो मुद्दे स्थाई रूप से फन काढ़े बैठे हैं जिनके चलते नक्सलबाड़ी से कम्यूनिस्ट आंदोलन का लाल सलाम आज लाल रक़्त में

उफ ये सरकारी तंत्र

घोटाले, हेर-फेर और सबूत मिटाने की तरक़ीबें क्या आईएएस-पीसीएस के पाठ्यक्रम का अनिवार्य अंग होता है? सरकारी अफसर भ्रष्ट होते हैं अथवा सम्पूर्ण सरकारी तंत्र ही भ्रष्ट है कि इनमें शामिल होते ही हर अधिकारी को भ्रष्टाचार छूत की बीमारी की तरह घेर लेता है। सीधा काम हो, मामूली अर्ज़ी देनी हो अथवा किसी विभाग से कोई सामान्य एवं न्यायोचित मंज़ूरी लेनी हो, नीचे से ऊपर तक हर अधिकारी को पैसा खिलाना एक नियम बन गया है। इस बार सरकार सबसे पहले अपने ही अफसरों के सिर पर चढ़ कर नाच रही है, देखते हैं आने वाला समय कुछ बदलाव लेकर आयेगा या फिर ब्लैक होल और बड़ा हो जाएगा…। पेट न हुआ ब्लैक होल हो गया, ऐसी भूख जो कभी ख़त्म ही नही होती। ये प्राणी जन्म से भुख्खड़ नही होते पर पता नही कैसे ब्यूरोक्रेट शब्द से जुड़ते ही इनकी भूख वासना की चरम सीमा को भी लांघ जाती है। सरकारी अफसर बनते ही पेट बड़ा हो जाता है। इनकी और इनके परिवार की लालसाएं थाह नही पातीं, जो परिवार कभी एक कमरे में रहा हो, सीमित रोटी दाल जैसे भोजन से पेट भरा हो, उस परिवार को 10 कमरों के बंगले में भी घुटन ही महसूस होती है फिर उस घुटन से ताज़ा हवा लेने के लिए विदेश यात्राएं भी आवश्यक हो जाती हैं। रोटी दाल वही होती है बस स्टील की आड़ी पिचकी कटोरियों की जगह विदेशी क्रिस्टल कटलरी ले लेती है। हराम की कहिए या मुफ्त की, सेवाएं लेने की ऐसी आदत पड़ जाती है

योगी सरकार बनाम 3 तलाक

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने अपने निर्णयों के दम पर सभी प्रदेशवासियों का दिल जीत लिया है। योगी सरकार बनने के बाद से लेकर वर्तमान समय तक विपक्ष का एक भी नेता योगी जी के कार्यों में कमी ढूंढने में समर्थ नही हो सका है। अन्य पार्टियों को समर्थन करने वाले लोग भी आज योगीमय हो गए हैं। पिछले कई दिनों से मुस्लिम महिलाएं 3 तलाक के मुद्दे पर न्याय के लिए पुरज़ोर लड़ रही हैं पर अभी तक उनके द्वारा जिस इंसाफ की मांग की जा रही थी वह इंसाफ तो दूर किसी प्रकार का कोई आसरा भी नहीं मिला। इन सब को देखते हुए योगी जी ने 3 तलाक से पीड़ित महिलाओं के लिए एक बड़ा निर्णय लिया है जिसके अनुसार 3 तलाक पीड़ित महिलाओं के लिए अब विधवा आश्रम की तर्ज पर आश्रम बनाए जाएंगे जहां उनके बच्चों की शिक्षा के लिए भी सम्पूर्ण व्यवस्था रहेगी और महिलाओं को स्वरोज़गार दिलाने के लिए उन्हें प्रशिक्षण एवं अवसर भी दिए जाएंगे जिसके लिए योगी सरकार द्वारा कार्य भी प्रारंभ कर दिया गया है। आकाश श्रीवास्तव

…क्यूंकि उसको मुझसे प्यार है

अभी कल ही तो मिला था, फिर पता नही कहां गया? मुझे समझ नही आता जब उन्हे इतनी जल्दी होती है तो वो आते ही क्यूं हैं! बेकार का ताम झाम, तैयारी बैठकी, लो वो आया और ये लो जैसे ही बैठने चले वो चल दिए। गुस्सा तो कई बार आता है लेकिन उस पर बिगड़ कर आगे मिलने का मौका मैं खोना नही चाहती। उसके बिना तो सारे काम ही रूक जाते हैं मेरे…दूसरों के पास भी जाना आना है उसका, पर मुझे बुरा नही लगता हां कभी कभी ऐसा ज़रूर लगता है कि वो पहले और ज़रा देर तक सिर्फ मेरे पास ही ठहरे। पहले बहुत कम आता था वो, शायद मैं उसको अहमियत कम देती थी तो वो देर तक मुझे सताता रहता था, सुकून से एक मन से कोई काम करने ही नही देता। अब इंतज़ार करती हूं तो साहब भाव ही नही देता। ये सब तो पुरानी रीत है, जबतक पीछे भागो कोई पूछता नही और मुंह फेर लो तो पीछा होने लगता है। उस दिन देर तक उसकी राह देखती रही, घण्टों आंखें खोले छत की ओर ताकते हुए वक़्त बीता, फिर बेवजह टेलीविज़न खुला रहा, मैं बैठी रही कुछ भी नही देखा, थोड़ी नमकीन चबाई, थोड़ी चाय भी पी ली, काली चाय हल्की मीठी चुस्की ले लेकर उसके आने की आहट सुनने का प्रयास करती रही। अचानक सोचा दूसरों को भी तो उसकी ज़रूरत पड़ती है कितने ही हाथ कलम उठाकर उसकी प्रतीक्षा में शून्य ताकते रहते हैं। इतना सोच कर लैपटॉप बन्द

नक्सलवाद को रोकने में असफल रही है सरकारें-6

प्रश्न तो जस का तस बना हुआ, नक्सलवाद कम होने कि जगह दिनों दिन बढ़ता ही क्यूं जा रहा है? वर्षों से नक्सलवाद माओवाद का सफाया करने की बात करने वाली सरकारें आज की तारीख़ तक असफल ही रही हैं। दमन का हिंसात्मक और बौद्धिक दोनों तरह के प्रयास बड़े ज़ोर शोर से किए जाते रहे, यहां तक कि नोटबंदी की कार्यवाही भी आंशिक रूप से ही इन्हें नुकसान पहुंचा सके हैं किन्तु क्या इतने से इन नक्सलियों माओदस्युओं की कमर तोड़ी जा सकेगी? और शारीरिक अथवा मानसिक क्षति पहुंचने से क्या इन गुटों का सफाया हो जाएगा जिनकी जड़े 1967 से लेकर अब तक न जाने कितनी गहरी हो चुकी हैं। उल्टे कभी अलग अलग काम करने वाले नक्सलवादी और माओवादी अब लगभग एक हो चुके हैं, इनके उद्देश्य भी मिलते जुलते हैं और काम करने का तरीका भी, प्रधानमंत्री के दावों के उलट ये नक्सली अब नोटबंदी से प्रभावित होकर बैंक और एटीएम हमले पर भी उतारू हो गए हैं। इस सब का नतीजा केवल खू़न ख़राबे पर आकर ख़त्म होगा। देश में आज भी वो कारण वो मुद्दे स्थाई रूप से फन काढ़े बैठे हैं जिनके चलते नक्सलबाड़ी से कम्यूनिस्ट आंदोलन का लाल सलाम आज लाल रक़्त में परिवर्तित हो चुका है। उन वजहों पर क्यूं ख़ामोश पड़ी रहीं सरकारें? ‘‘समरथ को नही दोष गुसाईं‘‘ के ढर्रे पर रगड़ रही सरकारी गाड़ी को बीच पटरी पर खड़े ग़रीब गु़रबा क्यूं नही दिखते? अपनी वाह-वाही के हरे चश्में से सब हरा ही दिखता होगा पर यहां भारत माता के

तीन तलाक़ पर कानून से क्यूं हैं आज़म परेशान?

डिवोर्स या तलाक़ हर हाल में सिर्फ औरत की ज़िन्दगी भर की हार का दूसरा नाम है। चाहे वो औरत किसी भी धर्म,जात या समाज से ताल्लुक रखती हो। तीन तलाक़ पर कानून से क्यूं हैं आज़म परेशान? अगर उन्हें अपनी वाली छोड़नी है अभी छोड़ दें, कानून आने के बाद तलाक़ देना काफी महंगा साबित हो सकता है। वैसे भी शादी की अहमियत धीरे-धीरे समाज से ख़त्म हो रही है, छोटी-छोटी बातों पर डिवोर्स वैसे भी आजकल आम बात है। आज़म खान यूं भी वक़्त पर कहीं नही पहुंच पाते, सत्ता में रहे तो अपने कार्यालय पर नही पहुंच सके और न ही हाईकोर्ट की पेशी के वक़्त का उनको ख़्याल रहा। इसके लिए अपनी बीवी को ज़िम्मेदार ठहरा कर तलाक़ देकर दोबारा आज़ादी से जी सकते हैं…और अगर ऐसा नही है तो आज़म ख़ान जैसे शरीयत के ठेकेदारों को अपनी ही क़ौम की औरतों से इतनी नफरत क्यूं है? क्या औरतों के नाम पर हमदर्दी का एक भी शब्द उनकी ज़हरीली ज़बान से नही फूटता। क्या बुराई है अगर एक औरत अपनी बसी-बसाई गृहस्थी को बचाना चाहती है? क्यूं उसे तलवार की धार पर चलने को मजबूर करके, उस दिन तक रूके रहना जब तक बेटी तलाक़ लेकर मेहर की रकम के साथ घर नही लौट आती। इसे शरीयत का कानून कहें या उसकी आड़ में किया जाने वाला शादी के नाम का धन्धा? तलाक़ बाद एक औरत की मानसिक स्थिति कैसी हो जाती है इसके बारे में तो सिर्फ औरत ही बता सकती है जिस पर ऐसी

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