कातिलों से न्याय की मांग…

हाल ही में खुलासा हुआ कि पाकिस्तान के नए सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा ने ही अपने आतंकी सैनिकों को भारतीय सेना शहीदों के सर काटने का आदेश दिया था, बाजवा के तेवर अब भाजपा सरकार को सीधी चुनौती दे रहे हैं। कपिल सिब्बल जैसे लोग मोदी को चूड़िया भिजवाने की बात कह रहे हैं और जवाब में वैंकया नायडू कड़ी निंदा के अलावा और कुछ नही कहते, भाजपा की सुरक्षा नीतियां अब कमज़ोर दिखने लगी हैं, सेना ही अपने दम पर पड़ोसियों के कुकर्मों का प्रतिउत्तर दे रही है। सर्जिकल स्ट्राईक का असर भी ख़त्म ही हो चुका है, पाक सेना की ओर से सर्जिकल स्ट्राईक का जवाब भी आया कि,‘‘हमने सर्जिकल स्ट्राईक की तो भारत की नस्लें याद रखेंगी’’ गीदड़ भभकी ही सही पर रीढ़ में यह अदभुत साहस पाकिस्तान को कहीं न कहीं से निर्बाध मिल रहा है, चीन-पाकिस्तान का मेल इस साहस का बड़ा साक्ष्य है, अरूणाचल के कई हिस्सों को चीनी नाम देने के बाद, चीन अब अपने हितों की रक्षा का मुद्दा लेकर कश्मीर मसले पर भारत-पाक के बीच आ रहा है। पाकिस्तान जैसे बेसहारा, दिशाहीन देश के लिए चीन की कच्ची दीवार की टेक लगाने को काफी है। जब भी पाकिस्तान की बात होती है विभाजन का घाव टीस देने लगता है हृदय-मन दोनों विचलित हो उठते हैं, खुला घाव जिसे लगातार हो रहे घुसपैठों ने भरने ही नही दिया, वह इन दिनों जलन पैदा कर रहा है, शरीर का कटा हुआ हिस्सा अब सड़ांध उत्पन्न करने लगा है। वर्षों तक इसे साफ

अभी भी वक़्त है संभल जाओ बबुआ

बीते विधानसभा चुनावों में यादव कुल की बददिमाग़ नीतियां, जातिवाद के नाम पर भेदभाव और गृह कलेश का नज़ारा सभी देख चुके हैं। सच हो या प्रचार का तरीका लाभ शून्य ही रहा, उनका कांग्रेसी गठबंधन भी मूर्खता के चरम को दर्शाता रहा और आने वाले निकाय चुनावों में अलग-अलग लड़ने के फैसले ने इस बात पर मुहर लगा दी कि अखिलेश निहायत ही जल्दबाज़ हैं और उन्हें निर्णय लेना नही आता। टैंकर में गंगाजल भर कर मुख्यमंत्री आवास धुलवाने जैसे मुंगेरी स्वप्न तो दूर की बात वरन् इसके उलट यदि अखिलेश मानसिक स्वच्छता पर थोड़ी मेहनत कर लें तो शायद अगली बार वे विपक्ष में बैठ सकें, शर्त यही कि कांग्रेस जैसी टूटी लाठी और बसपा की डूबती नाव पर सवार होने की भूल न करें। अभी से सावधान हों वरना भाजपा जैसे समुद्र में प्रदेश स्तर की छोटी-बड़ी पार्टियों का डूब जाना वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में कोई बड़ी बात नही रही। अपना अस्तित्व बनाए रखना ही आज समाजवादी पार्टी के सामने एकमात्र चुनौती है, इस अभियान में अपने विरोधियों की बुराई के बजाय पार्टी की खोई गरिमा और पहचान को वापस कमाना बड़ी चुनौती है। इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए कोई घमण्ड से भरा मस्तक नही वरन् एक सहज व्यक्तित्व की आवश्यकता है, जो उस अखिलेश के लिए मुश्किल नही जिसने कभी अपने पिता के चलते बेहद युवा अवस्था में मुख्यमंत्री पद संभाला और लोगों की उम्मीदें बढ़ाईं। समय बदलते देर नही लगती, उत्थान पतन का खेल तो चलता ही रहेगा आखिरकार 45-50 की आयु तो

नक्सलवाद पर हावी होने का असफल प्रयास

सरकार की रणनीति पर ही प्रश्नचिन्ह लगा है क्यूंकि सरकार नक्यलवाद पर हावी होकर अपनी वाह-वाही बटोरना चाहती है, काबू पाने के उनके सारे तरीके असफल सिद्ध हुए हैं। नक्सलवाद के मामले में सरकार ने केवल झूठे दावे ही किए, नोटबंदी से नक्सलवाद को नुकसान बड़ा झूठ, उल्टे नक्सलियों को जंगल से बाहर आकर बैंक, एटीएम और अन्य जगहों पर डकैतियां डालने को उकसाने का काम किया गया है। वर्षों से नक्सलवाद माओवाद का सफाया करने की बात करने वाली सरकारें आज की तारीख़ तक असफल ही रही हैं। दमन का हिंसात्मक और बौद्धिक दोनों तरह के प्रयास बड़े ज़ोर शोर से किए जाते रहे, यहां तक कि नोटबंदी की कार्यवाही भी आंशिक रूप से ही इन्हें नुकसान पहुंचा सके हैं किन्तु क्या इतने से इन नक्सलियों माओदस्युओं की कमर तोड़ी जा सकेगी? और शारीरिक अथवा मानसिक क्षति पहुंचने से क्या इन गुटों का सफाया हो जाएगा जिनकी जड़े 1967 से लेकर अब तक न जाने कितनी गहरी हो चुकी हैं। उल्टे कभी अलग अलग काम करने वाले नक्सलवादी और माओवादी अब लगभग एक हो चुके हैं, इनके उद्देश्य भी मिलते जुलते हैं और काम करने का तरीका भी, प्रधानमंत्री के दावों के उलट ये नक्सली अब नोटबंदी से प्रभावित होकर बैंक और एटीएम हमले पर भी उतारू हो गए हैं। इस सब का नतीजा केवल खू़न ख़राबे पर आकर ख़त्म होगा। देश में आज भी वो कारण वो मुद्दे स्थाई रूप से फन काढ़े बैठे हैं जिनके चलते नक्सलबाड़ी से कम्यूनिस्ट आंदोलन का लाल सलाम आज लाल रक़्त में

योगी सरकार बनाम 3 तलाक

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने अपने निर्णयों के दम पर सभी प्रदेशवासियों का दिल जीत लिया है। योगी सरकार बनने के बाद से लेकर वर्तमान समय तक विपक्ष का एक भी नेता योगी जी के कार्यों में कमी ढूंढने में समर्थ नही हो सका है। अन्य पार्टियों को समर्थन करने वाले लोग भी आज योगीमय हो गए हैं। पिछले कई दिनों से मुस्लिम महिलाएं 3 तलाक के मुद्दे पर न्याय के लिए पुरज़ोर लड़ रही हैं पर अभी तक उनके द्वारा जिस इंसाफ की मांग की जा रही थी वह इंसाफ तो दूर किसी प्रकार का कोई आसरा भी नहीं मिला। इन सब को देखते हुए योगी जी ने 3 तलाक से पीड़ित महिलाओं के लिए एक बड़ा निर्णय लिया है जिसके अनुसार 3 तलाक पीड़ित महिलाओं के लिए अब विधवा आश्रम की तर्ज पर आश्रम बनाए जाएंगे जहां उनके बच्चों की शिक्षा के लिए भी सम्पूर्ण व्यवस्था रहेगी और महिलाओं को स्वरोज़गार दिलाने के लिए उन्हें प्रशिक्षण एवं अवसर भी दिए जाएंगे जिसके लिए योगी सरकार द्वारा कार्य भी प्रारंभ कर दिया गया है। आकाश श्रीवास्तव

तीन तलाक़ पर कानून से क्यूं हैं आज़म परेशान?

डिवोर्स या तलाक़ हर हाल में सिर्फ औरत की ज़िन्दगी भर की हार का दूसरा नाम है। चाहे वो औरत किसी भी धर्म,जात या समाज से ताल्लुक रखती हो। तीन तलाक़ पर कानून से क्यूं हैं आज़म परेशान? अगर उन्हें अपनी वाली छोड़नी है अभी छोड़ दें, कानून आने के बाद तलाक़ देना काफी महंगा साबित हो सकता है। वैसे भी शादी की अहमियत धीरे-धीरे समाज से ख़त्म हो रही है, छोटी-छोटी बातों पर डिवोर्स वैसे भी आजकल आम बात है। आज़म खान यूं भी वक़्त पर कहीं नही पहुंच पाते, सत्ता में रहे तो अपने कार्यालय पर नही पहुंच सके और न ही हाईकोर्ट की पेशी के वक़्त का उनको ख़्याल रहा। इसके लिए अपनी बीवी को ज़िम्मेदार ठहरा कर तलाक़ देकर दोबारा आज़ादी से जी सकते हैं…और अगर ऐसा नही है तो आज़म ख़ान जैसे शरीयत के ठेकेदारों को अपनी ही क़ौम की औरतों से इतनी नफरत क्यूं है? क्या औरतों के नाम पर हमदर्दी का एक भी शब्द उनकी ज़हरीली ज़बान से नही फूटता। क्या बुराई है अगर एक औरत अपनी बसी-बसाई गृहस्थी को बचाना चाहती है? क्यूं उसे तलवार की धार पर चलने को मजबूर करके, उस दिन तक रूके रहना जब तक बेटी तलाक़ लेकर मेहर की रकम के साथ घर नही लौट आती। इसे शरीयत का कानून कहें या उसकी आड़ में किया जाने वाला शादी के नाम का धन्धा? तलाक़ बाद एक औरत की मानसिक स्थिति कैसी हो जाती है इसके बारे में तो सिर्फ औरत ही बता सकती है जिस पर ऐसी

लाख का घर सिद्ध होगा महागठबंधन

सबसे बड़ा प्रश्न अगर मोदी विरोधी महागठबन्धन बन भी गया तो कौन होगा नेता? गठबंधन तो दूर की बात पहले सारे राजनीतिक दलों के बड़े नेता जो बरसों से प्रधान कुर्सी की आस में एक पैर कब्र में एक पांव कुर्सी पर धरे प्रतीक्षा कर रहे हैं उनमें से कौन अपने सपनों की कुर्बानी देगा? मायावती? नितीश कुमार? अजीत सिंह? ममता बनर्जी? या फिर कोई और? जिनके पास अब पांच वर्ष तक प्रतीक्षा करने का धैर्य नही बचा वो मौका मिलने पर कभी भी अपनी शर्तें मनवाने से बाज़ नही आएंगे। जीत भी गए तो भी मल्टीग्रेन सरकार को पचा पाना देश की जनता के लिए बेहद मुश्किल साबित होने वाला है। अभी तो द्राविण क्षेत्र की बात भी नही हुई? द्रमुक और अन्ना द्रमुक कभी भी साथ नही आएंगे, न ही मां माटी मानुष के नाम पर बंगाल का सत्यानाश कर रहीं ममता दीदी कम्यूनिस्टों से हाथ मिलाएंगी। इसी बीच मायावती अपने मूल स्वभाव आड़े वक़्त पे धोखा देना के लिए बेहद प्रसिद्ध हैं, अपनी ज़िद के लिए प्रसिद्ध नितीश कुमार कभी भी ढीठ व्यक्तित्व लालू यादव संग बैठ कर चाय नही पीना चाहेंगे, कभी भी संतुष्ट न हो पाने की प्रवृत्ति के स्वामी अजीत सिंह भी अड़ियल रवैये के लिए जाने जाते हैं। इन सबको साथ आने के लिए मना भी लिया गया फिर भी इस महागठबंधन के सिर पर आरामशीन हमेशा चालू स्थिति में झूलती रहेगी। ये ऐसा लाख का घर सिद्ध होगा जिससे निकालने को इस बार विदुर कोई चूहा नही भेज सकेंगे, आपसी मनमुटाव की

इनसे मिलिए ये हैं पप्पू

पप्पू कहते ही आप ग़लत क्यूं सोचने लगते हैं, पप्पू दरअसल परमपूजनीय का शॉर्टफार्म है, बीच में आधा प वार्तालाप की सहूलियत के लिए जोड़ा गया था। पपू कहने में होंठ चिपकते हैं न इसलिए? इस नाम में कोई बुराई नही, बुराई तो राहू में है। राहू लो आया दशा बिगड़ी समझो! पेट खराब, धन हानि, अपमान, बुद्धि भ्रष्ट, ग़लत निर्णय और बबुआ डूबे गर्त में। जिस पर भी बैठेगा तोड़ मरोड़ के ही उठेगा, बहरहाल बात उसी की हो रही है, जिसकी आप समझ रहे। इस प्रकार के कई जीव होते हैं, जिनके बारे में कहावत है कि, जहं-जहं पैर पड़े संतन के तहं-तहं बंटाधार! हैरत इस बात की है बचपन से ही ऐसा पालन पोषण हुआ है इस जीव का कि शर्म, शर्मिन्दगी और पछतावा इसे दूर से भी छूकर नही गया। कमाल का व्यक्तित्व, इसी कारण से इन्हें परमपूजनीय के शॉटफॉर्म नाम पप्पू से देश भर की जनता ने मिल कर सम्मानित किया है। गठजोड़ में पप्पू का होना बेहद आवश्यक है, तभी भाजपा का सूर्य और प्रबल होगा। लगभग खाली हो चुकी कांग्रेस के पास अभी कुछ नाम और हैं जिनका बाहर जाना तय है। बस उनके जाते ही परमपूजनीय राहुल गांधी एक बड़ी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाएंगे। अब आप अपने दिमाग़ पर ज़ोर डाल रहे होंगे कि कौन सी ज़िम्मेदारी? भई देश के उत्थान की ज़िम्मेदारी, देश का प्रधानमंत्री बनकर जो निभानी थी?, इसके अलावा बबुआ और बुआ को अन्तिम घाट लगाए बिना इसे कहां चैन आने वाला। एक तरह से भाजपा के लिए

माया महाठगनी हम जानी

वो जो खुद जात बिरादरी के नाम पर जोड़ तोड़ समीकरण और गठजोड़ की राजनीति पे निर्भर थे उन्हें मोदी भय ने एक साथ रहना सिखा दिया। कुत्ते वास्तव में झुण्ड में रहते हैं, शेर अकेला चलता है वाली कहावत एक हद तक सही साबित होने को है और जानवरों पर बनी इस कहावत को इंसानों पर हावी होते देखने का इतिहास बनाएगा उत्तर प्रदेश! बुआ,बबुआ और पप्पू सब साथ आकर हिसाब का बही खाता मथेंगे कि कौन किस जात धर्म के नाम पर कितने वोट बटोर कर ला सकता है। हांलाकि ईवीएम मशीन पर उठी उंगली का जवाब जनता से स्वयं ही दे दिया। अम्बेडकर के नाम पर दलित वोट लेकर दलितों को विकास के डब्बे में ठेंगा बांटने वाली मायावती को अम्बेडकर जयन्ती पर उन्हीं लोगों ने खुलेआम ठेंगा दिखा दिया। भाषण के नाम पर एक स्वर और विचित्र लहजे में मंच पर कथा बांचने वाली बहनजी का तर्क था कि उन्हें डाक्टर ने चीखने चिल्लाने से मना कर दिया है लिहाज़ा मायावती के अपने लोगों ने उन्हें बोलने की ज़िम्मेदारी से ही मुक्त कर दिया। अब उन्हें बोलने की ज़रूरत नही क्यूंकि सुनने वाला अब कोई नही! मायावती जिस रूप में उत्तर प्रदेश की राजनीति में उभरी थीं वह इतिहास बन गया बिल्कुल ऐसे ही उनका पतन भी अब इतिहास के रूप में ही दर्ज किया जाएगा। मुलायम सिंह से बदला लेने के पीछे वे पहले भी राज-काज को भुला चुकी थीं, उसके बाद धन लोलुपता के पीछे वे समाज सेवा भूल गईं, और अब अपने बचे-खुचे

घमण्ड भरा मस्तक नही सहज व्यक्तित्व चाहिए

बबुआ की नीयत में बातचीत में और हाव भाव में कोई परिवर्तन नही आया है, वो कहते हैं न कि रस्सी जल गई पर बल नही गए। यहां तो रस्सी ही कोई ले गया पर हवा में लटके अखिलेश को कोई दिक्कत नही दिख रही, उनका ऐसा अड़ियल रवैया उनकी कुन्द बुद्धि का सबूत दे रहा है जहां वे अपनी पार्टी की बैठकों में आदित्यनाथ पर चुटकी लेते, मंत्रियों अधिकारियों की बुराई करते नज़र आते हैं। अपने समाजवाद फटे ढोल को मरम्मत करने पर वे अधिक ध्यान दे ंतो उनका राजनीतिक भविष्य संभवतः थोड़ी बहुत उम्मीद की किरण देख सकता है। टैंकर में गंगाजल भर कर मुख्यमंत्री आवास धुलवाने का उनका मुंगेरी स्वप्न तो दूर की बात वरन् इसके उलट यदि थोड़ी मेहनत कर लें तो शायद अगली बार शायद वे विपक्ष में बैठने लायक जगह बना लें, शर्त इतनी सी कि दोबारा कांग्रेस जैसी टूटी लाठी और बसपा जैसी डूबती नाव पर सवार होने की भूल न करें। अभी से सावधान हों वरना भाजपा जैसे समुद्र में प्रदेश स्तर की छोटी-बड़ी पार्टियों का डूब जाना आज की तारीख़ में कोई बड़ी बात नही रही। अपना अस्तित्व बनाए रखना ही आज समाजवादी पार्टी के सामने बहुत बड़ी चुनौती है, इस अभियान में अपने विरोधियों की बुराई करने की बजाय पार्टी के संविधान और आदर्शों की रक्षा और पार्टी की खोई गरिमा और पहचान को वापस कमाना बड़ी चुनौती है। इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए कोई घमण्ड से भरा मस्तक नही वरन् एक सहज व्यक्तित्व की आवश्यकता है, जो

Page 1 of 212