जीएसटी का सत्य अभी अधूरा है

 टैक्स देने के नाम पर नानी का स्वर्गवास हो जाने की परम्परा पुरानी है, सौ बहाने कारण एक, मेहनत मेरी मैं सरकार को क्यूं मुनाफा दूं? देश में जीवित रहने, खाने-पीने, सुरक्षित रहने का भी कोई टैक्स देता है भला? पहले ही घर का टैक्स, पानी का टैक्स, रोड टैक्स सब भर रहा हूं उस पर से कारोबार करके अपनी मेहनत से जो कमाऊं उसका भी इन्कम टैक्स भरूं? ये भाषा उन्हीं गुलामों के वंशजों की है जो एक अर्से तक मुस्लिम शासकों को अपने धर्म का पालन करने और तीर्थ यात्रा के नाम पर जज़िया टैक्स भरते रहे, उसके बाद अंग्रेज़ों को अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा लगान की शक़्ल में देकर उनसे अभयदान लेते रहे और उन्हीं का पालन पोषण करते रहे। स्मरण रहे कि यह लगान वही टैक्स था जो बगैर किसी प्रकार का फायदा पहुंचाए अंग्रेज़ी सरकार हमसे वसूलती रहती थी जिससे उनकी छावनी के सैनिकों, हथियारों जिनका प्रयोग वे हमारे ही देश पर बने रहने के लिए करते थे और अंग्रेज़ों की अय्याशियों पर खर्च किया जाता था। आज हमसे हमारी ही सरकार हमारी ही भलाई और विकास के नाम पर सरकारी फायदों और सहूलियत के नाम पर छोटा सा सदका मांगती है तो कितना कष्ट होता है। जब बातों के बताशे फोड़े जाते हैं तो पढ़े लिखे कुछ गंवार एक बात कहते हैं कि दुनियादारी एक दूसरे के सहयोग से चलती है, और जब वास्तविक सहयोग का समय आता है तो विरोध की चिंगारिया छूटने लगती हैं। एक बात याद रहे कि किसी पर

नारी सम्मान में व्यवधान क्यूं?

मां-बहन के बाद किसी भी अन्य स्त्री को सम्मान देने में इतनी दुविधा? आत्मरक्षा, अस्तित्व रक्षा, चरित्र रक्षा बस यही कुछ रह गया है एक औरत के आंचल में। विधवा विवाह, बाल विवाह, दहेज प्रथा, तीन तलाक़ और न जाने कितने की भेदभाव के दंश चुभे हैं, जो पीड़ा बढ़ाते जा रहे हैं, इस पीड़ा की औषधि किसी धर्म, जाति के ठेकेदार के पास नही है किसी राजनीतिक पार्टी का ये मुद्दा नही बन सकता, कोई भी राजनीतिज्ञ, वर्तमान नेता या मंत्री, स्त्री पक्ष से जुड़े मुद्दे को अपना वोट बैंक नष्ट नही करने दे सकता। फिर किस काम के राष्ट्रपिता, राष्ट्र ऋषि, युग पुरूष, विकास पुरूष ये नाम केवल स्त्री शक्ति पर अपने वर्चस्व को बनाए रखने का ढोंग नही तो और क्या है? नारी के साथ लगातार उसका भविष्य छल कर रहा है, सरकार किसी की भी हो राज-पाट कोई भी चलाए, परिस्थितियां कभी भी पक्ष नही लेतीं, धर्म, जाति, समाज, परिवार ये सारे शब्द केवल पुरूषों के लिए ही बनाए गए हैं अतः उन्हीं के सहायक भी हैं किन्तु नारी की समस्याएं सुलझाने में स्वयं एक नारी भी पुरूष प्रधान जाल में उलझ कर रह जाती है। असल में समस्याओं को आधार बनाकर ही नारी के आकार प्रकार की कल्पना की गई होगी। सिकुड़न और लकीरों से मुक्त माथा जहां शादी से पहले रंगबिरंगी बिन्दी और शादी के बाद लाल सिंदूरी बिन्दी शोभती है उसके पीछे एक कोमल विचार भी है जिसे हर कोई अपनी सुविधानुसार ढालता बदलता जाता है। उसी में कहीं उसका भाग्य भी छिप

कातिलों से न्याय की मांग…

हाल ही में खुलासा हुआ कि पाकिस्तान के नए सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा ने ही अपने आतंकी सैनिकों को भारतीय सेना शहीदों के सर काटने का आदेश दिया था, बाजवा के तेवर अब भाजपा सरकार को सीधी चुनौती दे रहे हैं। कपिल सिब्बल जैसे लोग मोदी को चूड़िया भिजवाने की बात कह रहे हैं और जवाब में वैंकया नायडू कड़ी निंदा के अलावा और कुछ नही कहते, भाजपा की सुरक्षा नीतियां अब कमज़ोर दिखने लगी हैं, सेना ही अपने दम पर पड़ोसियों के कुकर्मों का प्रतिउत्तर दे रही है। सर्जिकल स्ट्राईक का असर भी ख़त्म ही हो चुका है, पाक सेना की ओर से सर्जिकल स्ट्राईक का जवाब भी आया कि,‘‘हमने सर्जिकल स्ट्राईक की तो भारत की नस्लें याद रखेंगी’’ गीदड़ भभकी ही सही पर रीढ़ में यह अदभुत साहस पाकिस्तान को कहीं न कहीं से निर्बाध मिल रहा है, चीन-पाकिस्तान का मेल इस साहस का बड़ा साक्ष्य है, अरूणाचल के कई हिस्सों को चीनी नाम देने के बाद, चीन अब अपने हितों की रक्षा का मुद्दा लेकर कश्मीर मसले पर भारत-पाक के बीच आ रहा है। पाकिस्तान जैसे बेसहारा, दिशाहीन देश के लिए चीन की कच्ची दीवार की टेक लगाने को काफी है। जब भी पाकिस्तान की बात होती है विभाजन का घाव टीस देने लगता है हृदय-मन दोनों विचलित हो उठते हैं, खुला घाव जिसे लगातार हो रहे घुसपैठों ने भरने ही नही दिया, वह इन दिनों जलन पैदा कर रहा है, शरीर का कटा हुआ हिस्सा अब सड़ांध उत्पन्न करने लगा है। वर्षों तक इसे साफ

निंदा ही मुक्ति मार्ग

जनता जो पढ़ना चाहती हैं, चलो वही लिख कर दे देती हूं। सत्य गले उतरता नही, झूठी प्रशंसा सत्य कलम से लिखी जा नही सकती, निंदा का गरल ही थूक देती हूं, वही तो है जो मस्तिष्क के बांध को तोड़कर बाहर आना चाहता है, रिस रहा है किन्तु भीतर की ओर, जन सामान्य के लिए रोचक चर्चा का विषय चाहे पड़ोसी हो, मित्र हो अथवा नाते-रिश्तेदार निन्दा प्रत्येक रूप में आनंददायिनी है। जीभ को भी अधिक कष्ट नही होता निंदा कहने करने में वहीं प्रशंसा होंठ,ठोढ़ी और जीभ तीनों को कस देता है, बोल कर देखिए। यहीं से तो पत्रकार और पत्रकारिता का प्रारंभ है, प्रशंसा चाटुकारिता है, और निंदा पत्रकारिता, निंदक नियरे राखिए…निंदा जिसे पत्रकारिता की भाषा में समीक्षा, टिप्पणी अथवा विश्लेषण भी कहा जाता हैं। लोकतंत्र में भावाभिव्यक्ति की भरपूर स्वतंत्रता है, और यह स्वतंत्रता पाठक लेखक दोनों को ही प्राप्त है, अगर पाठक को मन की बात पढ़ने को न मिले तो लेखन का दोष यदि लेखक मन की बात न कह सके तो उसका ज्ञान स्वयं उसीकी परिपाटी पर खरा नही उतरता! हर परिस्थिति में निंदा ही विजय मार्ग है, कड़ी निंदा… पत्रकार ही क्यूं राजनीतिज्ञों के लिए भी निंदा ही मुक्ति मार्ग है, नक्सलवाद की निंदा, आतंकवाद की निंदा, विपक्ष में हैं तो पक्ष की निंदा और सरकार में हैं तो प्रशासनिक अधिकारियों कर्मचारियों की निंदा; फलस्वरूप चहुं ओर निंदा ही निंदा! केवल पीछा छुड़ाने का षड़यंत्र ही नही वरन किसी मुद्दे को लम्बे समय तक ठण्डे बस्ते में डाल कर भूल जाने का

एक तो चोरी, ऊपर से सीनाज़ोरी

विगत कई वर्षों से प्रदेश में लूटपाट कर रहे पेट्रोल पम्पों के खिलाफ जब प्रशासन ने कार्यवाही करने का काम प्रारम्भ किया तब पेट्रोल पंप एसोसिएशन ने लखनऊ में हड़ताल कर यह साबित कर दिया है कि चोर चोर मौसेरे भाई ही होते हैं। बीते कुछ दिनों में लखनऊ के कुछ पेट्रोल पम्पों पर STF ने रेड डाली जिसमे 7 पेट्रोल पम्पों को तेल चोरी के आरोप में सीज़ कर दिया गया है। इसके बाद सरकार ने अपनी इस मुहिम को आगे बढाते हुए जांच को और अधिक तेज़ी से बढ़ाने का विचार किया जिससे भयभीत होकर भ्रष्ट पेट्रोल पंप संचालकों ने हड़ताल कर दी है। लखनऊ पेट्रोल पंप एसोसिएशन की हड़ताल को देखते हुए यह कहना भी गलत नहीं होगा कि एक नहीं बल्कि सब के सब भ्रष्टाचार रूपी कीचड़ से सने हुए हैं। प्रदेश सरकार से अनुरोध है कि अपनी इस मुहिम में और तीव्रता लाएं और जो पेट्रोल पंप हड़ताल करने में जुटे रहते हैं उन सबके लाइसेंस रद्द करे।

अभी भी वक़्त है संभल जाओ बबुआ

बीते विधानसभा चुनावों में यादव कुल की बददिमाग़ नीतियां, जातिवाद के नाम पर भेदभाव और गृह कलेश का नज़ारा सभी देख चुके हैं। सच हो या प्रचार का तरीका लाभ शून्य ही रहा, उनका कांग्रेसी गठबंधन भी मूर्खता के चरम को दर्शाता रहा और आने वाले निकाय चुनावों में अलग-अलग लड़ने के फैसले ने इस बात पर मुहर लगा दी कि अखिलेश निहायत ही जल्दबाज़ हैं और उन्हें निर्णय लेना नही आता। टैंकर में गंगाजल भर कर मुख्यमंत्री आवास धुलवाने जैसे मुंगेरी स्वप्न तो दूर की बात वरन् इसके उलट यदि अखिलेश मानसिक स्वच्छता पर थोड़ी मेहनत कर लें तो शायद अगली बार वे विपक्ष में बैठ सकें, शर्त यही कि कांग्रेस जैसी टूटी लाठी और बसपा की डूबती नाव पर सवार होने की भूल न करें। अभी से सावधान हों वरना भाजपा जैसे समुद्र में प्रदेश स्तर की छोटी-बड़ी पार्टियों का डूब जाना वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में कोई बड़ी बात नही रही। अपना अस्तित्व बनाए रखना ही आज समाजवादी पार्टी के सामने एकमात्र चुनौती है, इस अभियान में अपने विरोधियों की बुराई के बजाय पार्टी की खोई गरिमा और पहचान को वापस कमाना बड़ी चुनौती है। इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए कोई घमण्ड से भरा मस्तक नही वरन् एक सहज व्यक्तित्व की आवश्यकता है, जो उस अखिलेश के लिए मुश्किल नही जिसने कभी अपने पिता के चलते बेहद युवा अवस्था में मुख्यमंत्री पद संभाला और लोगों की उम्मीदें बढ़ाईं। समय बदलते देर नही लगती, उत्थान पतन का खेल तो चलता ही रहेगा आखिरकार 45-50 की आयु तो

नक्सलवाद पर हावी होने का असफल प्रयास

सरकार की रणनीति पर ही प्रश्नचिन्ह लगा है क्यूंकि सरकार नक्यलवाद पर हावी होकर अपनी वाह-वाही बटोरना चाहती है, काबू पाने के उनके सारे तरीके असफल सिद्ध हुए हैं। नक्सलवाद के मामले में सरकार ने केवल झूठे दावे ही किए, नोटबंदी से नक्सलवाद को नुकसान बड़ा झूठ, उल्टे नक्सलियों को जंगल से बाहर आकर बैंक, एटीएम और अन्य जगहों पर डकैतियां डालने को उकसाने का काम किया गया है। वर्षों से नक्सलवाद माओवाद का सफाया करने की बात करने वाली सरकारें आज की तारीख़ तक असफल ही रही हैं। दमन का हिंसात्मक और बौद्धिक दोनों तरह के प्रयास बड़े ज़ोर शोर से किए जाते रहे, यहां तक कि नोटबंदी की कार्यवाही भी आंशिक रूप से ही इन्हें नुकसान पहुंचा सके हैं किन्तु क्या इतने से इन नक्सलियों माओदस्युओं की कमर तोड़ी जा सकेगी? और शारीरिक अथवा मानसिक क्षति पहुंचने से क्या इन गुटों का सफाया हो जाएगा जिनकी जड़े 1967 से लेकर अब तक न जाने कितनी गहरी हो चुकी हैं। उल्टे कभी अलग अलग काम करने वाले नक्सलवादी और माओवादी अब लगभग एक हो चुके हैं, इनके उद्देश्य भी मिलते जुलते हैं और काम करने का तरीका भी, प्रधानमंत्री के दावों के उलट ये नक्सली अब नोटबंदी से प्रभावित होकर बैंक और एटीएम हमले पर भी उतारू हो गए हैं। इस सब का नतीजा केवल खू़न ख़राबे पर आकर ख़त्म होगा। देश में आज भी वो कारण वो मुद्दे स्थाई रूप से फन काढ़े बैठे हैं जिनके चलते नक्सलबाड़ी से कम्यूनिस्ट आंदोलन का लाल सलाम आज लाल रक़्त में

उफ ये सरकारी तंत्र

घोटाले, हेर-फेर और सबूत मिटाने की तरक़ीबें क्या आईएएस-पीसीएस के पाठ्यक्रम का अनिवार्य अंग होता है? सरकारी अफसर भ्रष्ट होते हैं अथवा सम्पूर्ण सरकारी तंत्र ही भ्रष्ट है कि इनमें शामिल होते ही हर अधिकारी को भ्रष्टाचार छूत की बीमारी की तरह घेर लेता है। सीधा काम हो, मामूली अर्ज़ी देनी हो अथवा किसी विभाग से कोई सामान्य एवं न्यायोचित मंज़ूरी लेनी हो, नीचे से ऊपर तक हर अधिकारी को पैसा खिलाना एक नियम बन गया है। इस बार सरकार सबसे पहले अपने ही अफसरों के सिर पर चढ़ कर नाच रही है, देखते हैं आने वाला समय कुछ बदलाव लेकर आयेगा या फिर ब्लैक होल और बड़ा हो जाएगा…। पेट न हुआ ब्लैक होल हो गया, ऐसी भूख जो कभी ख़त्म ही नही होती। ये प्राणी जन्म से भुख्खड़ नही होते पर पता नही कैसे ब्यूरोक्रेट शब्द से जुड़ते ही इनकी भूख वासना की चरम सीमा को भी लांघ जाती है। सरकारी अफसर बनते ही पेट बड़ा हो जाता है। इनकी और इनके परिवार की लालसाएं थाह नही पातीं, जो परिवार कभी एक कमरे में रहा हो, सीमित रोटी दाल जैसे भोजन से पेट भरा हो, उस परिवार को 10 कमरों के बंगले में भी घुटन ही महसूस होती है फिर उस घुटन से ताज़ा हवा लेने के लिए विदेश यात्राएं भी आवश्यक हो जाती हैं। रोटी दाल वही होती है बस स्टील की आड़ी पिचकी कटोरियों की जगह विदेशी क्रिस्टल कटलरी ले लेती है। हराम की कहिए या मुफ्त की, सेवाएं लेने की ऐसी आदत पड़ जाती है

योगी सरकार बनाम 3 तलाक

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने अपने निर्णयों के दम पर सभी प्रदेशवासियों का दिल जीत लिया है। योगी सरकार बनने के बाद से लेकर वर्तमान समय तक विपक्ष का एक भी नेता योगी जी के कार्यों में कमी ढूंढने में समर्थ नही हो सका है। अन्य पार्टियों को समर्थन करने वाले लोग भी आज योगीमय हो गए हैं। पिछले कई दिनों से मुस्लिम महिलाएं 3 तलाक के मुद्दे पर न्याय के लिए पुरज़ोर लड़ रही हैं पर अभी तक उनके द्वारा जिस इंसाफ की मांग की जा रही थी वह इंसाफ तो दूर किसी प्रकार का कोई आसरा भी नहीं मिला। इन सब को देखते हुए योगी जी ने 3 तलाक से पीड़ित महिलाओं के लिए एक बड़ा निर्णय लिया है जिसके अनुसार 3 तलाक पीड़ित महिलाओं के लिए अब विधवा आश्रम की तर्ज पर आश्रम बनाए जाएंगे जहां उनके बच्चों की शिक्षा के लिए भी सम्पूर्ण व्यवस्था रहेगी और महिलाओं को स्वरोज़गार दिलाने के लिए उन्हें प्रशिक्षण एवं अवसर भी दिए जाएंगे जिसके लिए योगी सरकार द्वारा कार्य भी प्रारंभ कर दिया गया है। आकाश श्रीवास्तव

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