ईश्वर भी तुम्हे ऐसे ही रखेगा जैसे तुमने उसे रखा

थोड़ा बुरा महसूस होगा,  लगेगा इन लिखने वालों को और कोई काम नही जहां देखो किसी न किसी बात का बतंगड़ बना देते हैं पर करुं भी क्या…? मेरी ईश्वर में आस्था है और मेरे लिए ईश्वर सिर्फ पत्थर का बना ‘डेकोरेशन पीस’ न होकर जीवन्त अनुभूति है। मैंने सुना है कि एक विशेष समय तक पूजा पाठ करते रहने पर किसी भी मूर्ति या उससे जुड़ी वस्तु में प्राण आ जाते हैं, बिल्कुल किसी रिश्ते की तरह जब हम साल दर साल रिश्ते निभाते जाते हैं और एक दिन ऐसा आता है कि उस इन्सान के बिना हमारी जिन्दगी अधूरी लगने लगती है। किसी का बुरा नही चाह रही पर कहीं उस इन्सान का प्रत्यक्ष शरीर किसी कारण से क्षतिग्रस्त हो जाए जैसे बीमारी हो जाए या हाथ पांव न रहे या चेहरा विकृत हो जाए तो क्या रिश्ता खत्म हो जाता है या हम उसे घर से निकाल कर सड़क पर तो मरने नही छोड़ देते…आप सोचेंगे ये सब बेतुकी बातें लिख कर प्रवचन का सूत्रपात कर रही हूं परन्तु ऐसा नही है। कुछ दिनों पहले की बात है, जब घर की ओर पैदल टहलते हुए आ रही थी कि एकाएक ईश्वर के दर्शन हो गए, उद्वेलित मत होईए, ये दिव्य दर्शन मुझे चौराहे के किनारे लगे ट्रान्सफार्मर के पीछे हुए, जहां एक ओर कुछ कुत्ते भगवान की मूर्तियों पे लगा मीठा प्रसाद चाट रहे थे वहीं दूसरी तरफ गाय उनके पास ही मलमूत्र त्याग रही थी और ज़्यादा नही पर दो शूकर भी कुत्तों के डर से

जो जीवन जीना सिखाए वही गीता है

एक बार हाथों में उठाकर गीता का कोई भी पृष्ठ खोलो फिर देखो मन के किसी भी प्रश्न का त्वरित उत्तर किस प्रकार तुम्हारे समक्ष आ जाएगा। धार्मिक प्रवचन नही, ये तो काम की बात है, जिन दरवाज़ों पर शान्ति, स्थिरता और क्षमा का दान मांगने जाते हो वे दरवाज़े भी इसी रास्ते से होकर मिलेंगे। जिस आयु में गीता का ज्ञान मन में भरा जाना चाहिए, उस आयु में घरेलू विवाद, आधुनिक युग के संयंत्र, एवं भविष्य की चिन्ताएं कोमल मन पर ऐसे लेप दी जाती हैं कि बच्चों को कुछ सोचने समझने का मौका मिलने से पहले ही वे बड़े हो जाते हैं, जीवन जीने की कला सीखने के पहले ही, हम जीवन जीने लगते हैं, ये तो बिल्कुल वैसा ही है जैसे उड़ते हवाई जहाज़ को हाथों में थमाने के बाद कोई आपसे कहे चलो अब इसे उड़ाना सीखते हैं…नतीजा हर पल कुछ बुरा होने का भय मन में लिए हम उड़ते चले जाते हैं और चाह के भी कुछ नही सीख समझ पाते बस प्राण रक्षा के उपाय खोजते रह जाते हैं। स्कूलों में गीता अध्ययन आरंभ किए जाने पर विवाद जारी है, इसके असंख्य कारणों में से प्रथम पूर्वाग्रह से ग्रस्त कायर लोगों का दल जिन्हें लगता है कि गीता किसी विशेष वर्ग अथवा जाति हेतु है, इसके अलावा कुछ वो लोग जो हिन्दुत्व और हिन्दुवाद के ढोंग करते हैं परन्तु गीता को कभी हाथों में उठाने का भी कष्ट नही किया होगा, पढ़ना तो दूर की बात है। यदि वास्तव में गीता को अध्ययन

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