नक्सलवाद पर हावी होने का असफल प्रयास

सरकार की रणनीति पर ही प्रश्नचिन्ह लगा है क्यूंकि सरकार नक्यलवाद पर हावी होकर अपनी वाह-वाही बटोरना चाहती है, काबू पाने के उनके सारे तरीके असफल सिद्ध हुए हैं। नक्सलवाद के मामले में सरकार ने केवल झूठे दावे ही किए, नोटबंदी से नक्सलवाद को नुकसान बड़ा झूठ, उल्टे नक्सलियों को जंगल से बाहर आकर बैंक, एटीएम और अन्य जगहों पर डकैतियां डालने को उकसाने का काम किया गया है। वर्षों से नक्सलवाद माओवाद का सफाया करने की बात करने वाली सरकारें आज की तारीख़ तक असफल ही रही हैं। दमन का हिंसात्मक और बौद्धिक दोनों तरह के प्रयास बड़े ज़ोर शोर से किए जाते रहे, यहां तक कि नोटबंदी की कार्यवाही भी आंशिक रूप से ही इन्हें नुकसान पहुंचा सके हैं किन्तु क्या इतने से इन नक्सलियों माओदस्युओं की कमर तोड़ी जा सकेगी? और शारीरिक अथवा मानसिक क्षति पहुंचने से क्या इन गुटों का सफाया हो जाएगा जिनकी जड़े 1967 से लेकर अब तक न जाने कितनी गहरी हो चुकी हैं। उल्टे कभी अलग अलग काम करने वाले नक्सलवादी और माओवादी अब लगभग एक हो चुके हैं, इनके उद्देश्य भी मिलते जुलते हैं और काम करने का तरीका भी, प्रधानमंत्री के दावों के उलट ये नक्सली अब नोटबंदी से प्रभावित होकर बैंक और एटीएम हमले पर भी उतारू हो गए हैं। इस सब का नतीजा केवल खू़न ख़राबे पर आकर ख़त्म होगा। देश में आज भी वो कारण वो मुद्दे स्थाई रूप से फन काढ़े बैठे हैं जिनके चलते नक्सलबाड़ी से कम्यूनिस्ट आंदोलन का लाल सलाम आज लाल रक़्त में

उफ ये सरकारी तंत्र

घोटाले, हेर-फेर और सबूत मिटाने की तरक़ीबें क्या आईएएस-पीसीएस के पाठ्यक्रम का अनिवार्य अंग होता है? सरकारी अफसर भ्रष्ट होते हैं अथवा सम्पूर्ण सरकारी तंत्र ही भ्रष्ट है कि इनमें शामिल होते ही हर अधिकारी को भ्रष्टाचार छूत की बीमारी की तरह घेर लेता है। सीधा काम हो, मामूली अर्ज़ी देनी हो अथवा किसी विभाग से कोई सामान्य एवं न्यायोचित मंज़ूरी लेनी हो, नीचे से ऊपर तक हर अधिकारी को पैसा खिलाना एक नियम बन गया है। इस बार सरकार सबसे पहले अपने ही अफसरों के सिर पर चढ़ कर नाच रही है, देखते हैं आने वाला समय कुछ बदलाव लेकर आयेगा या फिर ब्लैक होल और बड़ा हो जाएगा…। पेट न हुआ ब्लैक होल हो गया, ऐसी भूख जो कभी ख़त्म ही नही होती। ये प्राणी जन्म से भुख्खड़ नही होते पर पता नही कैसे ब्यूरोक्रेट शब्द से जुड़ते ही इनकी भूख वासना की चरम सीमा को भी लांघ जाती है। सरकारी अफसर बनते ही पेट बड़ा हो जाता है। इनकी और इनके परिवार की लालसाएं थाह नही पातीं, जो परिवार कभी एक कमरे में रहा हो, सीमित रोटी दाल जैसे भोजन से पेट भरा हो, उस परिवार को 10 कमरों के बंगले में भी घुटन ही महसूस होती है फिर उस घुटन से ताज़ा हवा लेने के लिए विदेश यात्राएं भी आवश्यक हो जाती हैं। रोटी दाल वही होती है बस स्टील की आड़ी पिचकी कटोरियों की जगह विदेशी क्रिस्टल कटलरी ले लेती है। हराम की कहिए या मुफ्त की, सेवाएं लेने की ऐसी आदत पड़ जाती है

योगी सरकार बनाम 3 तलाक

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने अपने निर्णयों के दम पर सभी प्रदेशवासियों का दिल जीत लिया है। योगी सरकार बनने के बाद से लेकर वर्तमान समय तक विपक्ष का एक भी नेता योगी जी के कार्यों में कमी ढूंढने में समर्थ नही हो सका है। अन्य पार्टियों को समर्थन करने वाले लोग भी आज योगीमय हो गए हैं। पिछले कई दिनों से मुस्लिम महिलाएं 3 तलाक के मुद्दे पर न्याय के लिए पुरज़ोर लड़ रही हैं पर अभी तक उनके द्वारा जिस इंसाफ की मांग की जा रही थी वह इंसाफ तो दूर किसी प्रकार का कोई आसरा भी नहीं मिला। इन सब को देखते हुए योगी जी ने 3 तलाक से पीड़ित महिलाओं के लिए एक बड़ा निर्णय लिया है जिसके अनुसार 3 तलाक पीड़ित महिलाओं के लिए अब विधवा आश्रम की तर्ज पर आश्रम बनाए जाएंगे जहां उनके बच्चों की शिक्षा के लिए भी सम्पूर्ण व्यवस्था रहेगी और महिलाओं को स्वरोज़गार दिलाने के लिए उन्हें प्रशिक्षण एवं अवसर भी दिए जाएंगे जिसके लिए योगी सरकार द्वारा कार्य भी प्रारंभ कर दिया गया है। आकाश श्रीवास्तव

जीएसटी का सत्य अभी अधूरा है

 टैक्स देने के नाम पर नानी का स्वर्गवास हो जाने की परम्परा पुरानी है, सौ बहाने कारण एक, मेहनत मेरी मैं सरकार को क्यूं मुनाफा दूं? देश में जीवित रहने, खाने-पीने, सुरक्षित रहने का भी कोई टैक्स देता है भला? पहले ही घर का टैक्स, पानी का टैक्स, रोड टैक्स सब भर रहा हूं उस पर से कारोबार करके अपनी मेहनत से जो कमाऊं उसका भी इन्कम टैक्स भरूं? ये भाषा उन्हीं गुलामों के वंशजों की है जो एक अर्से तक मुस्लिम शासकों को अपने धर्म का पालन करने और तीर्थ यात्रा के नाम पर जज़िया टैक्स भरते रहे, उसके बाद अंग्रेज़ों को अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा लगान की शक़्ल में देकर उनसे अभयदान लेते रहे और उन्हीं का पालन पोषण करते रहे। स्मरण रहे कि यह लगान वही टैक्स था जो बगैर किसी प्रकार का फायदा पहुंचाए अंग्रेज़ी सरकार हमसे वसूलती रहती थी जिससे उनकी छावनी के सैनिकों, हथियारों जिनका प्रयोग वे हमारे ही देश पर बने रहने के लिए करते थे और अंग्रेज़ों की अय्याशियों पर खर्च किया जाता था। आज हमसे हमारी ही सरकार हमारी ही भलाई और विकास के नाम पर सरकारी फायदों और सहूलियत के नाम पर छोटा सा सदका मांगती है तो कितना कष्ट होता है। जब बातों के बताशे फोड़े जाते हैं तो पढ़े लिखे कुछ गंवार एक बात कहते हैं कि दुनियादारी एक दूसरे के सहयोग से चलती है, और जब वास्तविक सहयोग का समय आता है तो विरोध की चिंगारिया छूटने लगती हैं। एक बात याद रहे कि किसी पर

…क्यूंकि उसको मुझसे प्यार है

अभी कल ही तो मिला था, फिर पता नही कहां गया? मुझे समझ नही आता जब उन्हे इतनी जल्दी होती है तो वो आते ही क्यूं हैं! बेकार का ताम झाम, तैयारी बैठकी, लो वो आया और ये लो जैसे ही बैठने चले वो चल दिए। गुस्सा तो कई बार आता है लेकिन उस पर बिगड़ कर आगे मिलने का मौका मैं खोना नही चाहती। उसके बिना तो सारे काम ही रूक जाते हैं मेरे…दूसरों के पास भी जाना आना है उसका, पर मुझे बुरा नही लगता हां कभी कभी ऐसा ज़रूर लगता है कि वो पहले और ज़रा देर तक सिर्फ मेरे पास ही ठहरे। पहले बहुत कम आता था वो, शायद मैं उसको अहमियत कम देती थी तो वो देर तक मुझे सताता रहता था, सुकून से एक मन से कोई काम करने ही नही देता। अब इंतज़ार करती हूं तो साहब भाव ही नही देता। ये सब तो पुरानी रीत है, जबतक पीछे भागो कोई पूछता नही और मुंह फेर लो तो पीछा होने लगता है। उस दिन देर तक उसकी राह देखती रही, घण्टों आंखें खोले छत की ओर ताकते हुए वक़्त बीता, फिर बेवजह टेलीविज़न खुला रहा, मैं बैठी रही कुछ भी नही देखा, थोड़ी नमकीन चबाई, थोड़ी चाय भी पी ली, काली चाय हल्की मीठी चुस्की ले लेकर उसके आने की आहट सुनने का प्रयास करती रही। अचानक सोचा दूसरों को भी तो उसकी ज़रूरत पड़ती है कितने ही हाथ कलम उठाकर उसकी प्रतीक्षा में शून्य ताकते रहते हैं। इतना सोच कर लैपटॉप बन्द

नक्सलवाद को रोकने में असफल रही है सरकारें-6

प्रश्न तो जस का तस बना हुआ, नक्सलवाद कम होने कि जगह दिनों दिन बढ़ता ही क्यूं जा रहा है? वर्षों से नक्सलवाद माओवाद का सफाया करने की बात करने वाली सरकारें आज की तारीख़ तक असफल ही रही हैं। दमन का हिंसात्मक और बौद्धिक दोनों तरह के प्रयास बड़े ज़ोर शोर से किए जाते रहे, यहां तक कि नोटबंदी की कार्यवाही भी आंशिक रूप से ही इन्हें नुकसान पहुंचा सके हैं किन्तु क्या इतने से इन नक्सलियों माओदस्युओं की कमर तोड़ी जा सकेगी? और शारीरिक अथवा मानसिक क्षति पहुंचने से क्या इन गुटों का सफाया हो जाएगा जिनकी जड़े 1967 से लेकर अब तक न जाने कितनी गहरी हो चुकी हैं। उल्टे कभी अलग अलग काम करने वाले नक्सलवादी और माओवादी अब लगभग एक हो चुके हैं, इनके उद्देश्य भी मिलते जुलते हैं और काम करने का तरीका भी, प्रधानमंत्री के दावों के उलट ये नक्सली अब नोटबंदी से प्रभावित होकर बैंक और एटीएम हमले पर भी उतारू हो गए हैं। इस सब का नतीजा केवल खू़न ख़राबे पर आकर ख़त्म होगा। देश में आज भी वो कारण वो मुद्दे स्थाई रूप से फन काढ़े बैठे हैं जिनके चलते नक्सलबाड़ी से कम्यूनिस्ट आंदोलन का लाल सलाम आज लाल रक़्त में परिवर्तित हो चुका है। उन वजहों पर क्यूं ख़ामोश पड़ी रहीं सरकारें? ‘‘समरथ को नही दोष गुसाईं‘‘ के ढर्रे पर रगड़ रही सरकारी गाड़ी को बीच पटरी पर खड़े ग़रीब गु़रबा क्यूं नही दिखते? अपनी वाह-वाही के हरे चश्में से सब हरा ही दिखता होगा पर यहां भारत माता के

तीन तलाक़ पर कानून से क्यूं हैं आज़म परेशान?

डिवोर्स या तलाक़ हर हाल में सिर्फ औरत की ज़िन्दगी भर की हार का दूसरा नाम है। चाहे वो औरत किसी भी धर्म,जात या समाज से ताल्लुक रखती हो। तीन तलाक़ पर कानून से क्यूं हैं आज़म परेशान? अगर उन्हें अपनी वाली छोड़नी है अभी छोड़ दें, कानून आने के बाद तलाक़ देना काफी महंगा साबित हो सकता है। वैसे भी शादी की अहमियत धीरे-धीरे समाज से ख़त्म हो रही है, छोटी-छोटी बातों पर डिवोर्स वैसे भी आजकल आम बात है। आज़म खान यूं भी वक़्त पर कहीं नही पहुंच पाते, सत्ता में रहे तो अपने कार्यालय पर नही पहुंच सके और न ही हाईकोर्ट की पेशी के वक़्त का उनको ख़्याल रहा। इसके लिए अपनी बीवी को ज़िम्मेदार ठहरा कर तलाक़ देकर दोबारा आज़ादी से जी सकते हैं…और अगर ऐसा नही है तो आज़म ख़ान जैसे शरीयत के ठेकेदारों को अपनी ही क़ौम की औरतों से इतनी नफरत क्यूं है? क्या औरतों के नाम पर हमदर्दी का एक भी शब्द उनकी ज़हरीली ज़बान से नही फूटता। क्या बुराई है अगर एक औरत अपनी बसी-बसाई गृहस्थी को बचाना चाहती है? क्यूं उसे तलवार की धार पर चलने को मजबूर करके, उस दिन तक रूके रहना जब तक बेटी तलाक़ लेकर मेहर की रकम के साथ घर नही लौट आती। इसे शरीयत का कानून कहें या उसकी आड़ में किया जाने वाला शादी के नाम का धन्धा? तलाक़ बाद एक औरत की मानसिक स्थिति कैसी हो जाती है इसके बारे में तो सिर्फ औरत ही बता सकती है जिस पर ऐसी

लाख का घर सिद्ध होगा महागठबंधन

सबसे बड़ा प्रश्न अगर मोदी विरोधी महागठबन्धन बन भी गया तो कौन होगा नेता? गठबंधन तो दूर की बात पहले सारे राजनीतिक दलों के बड़े नेता जो बरसों से प्रधान कुर्सी की आस में एक पैर कब्र में एक पांव कुर्सी पर धरे प्रतीक्षा कर रहे हैं उनमें से कौन अपने सपनों की कुर्बानी देगा? मायावती? नितीश कुमार? अजीत सिंह? ममता बनर्जी? या फिर कोई और? जिनके पास अब पांच वर्ष तक प्रतीक्षा करने का धैर्य नही बचा वो मौका मिलने पर कभी भी अपनी शर्तें मनवाने से बाज़ नही आएंगे। जीत भी गए तो भी मल्टीग्रेन सरकार को पचा पाना देश की जनता के लिए बेहद मुश्किल साबित होने वाला है। अभी तो द्राविण क्षेत्र की बात भी नही हुई? द्रमुक और अन्ना द्रमुक कभी भी साथ नही आएंगे, न ही मां माटी मानुष के नाम पर बंगाल का सत्यानाश कर रहीं ममता दीदी कम्यूनिस्टों से हाथ मिलाएंगी। इसी बीच मायावती अपने मूल स्वभाव आड़े वक़्त पे धोखा देना के लिए बेहद प्रसिद्ध हैं, अपनी ज़िद के लिए प्रसिद्ध नितीश कुमार कभी भी ढीठ व्यक्तित्व लालू यादव संग बैठ कर चाय नही पीना चाहेंगे, कभी भी संतुष्ट न हो पाने की प्रवृत्ति के स्वामी अजीत सिंह भी अड़ियल रवैये के लिए जाने जाते हैं। इन सबको साथ आने के लिए मना भी लिया गया फिर भी इस महागठबंधन के सिर पर आरामशीन हमेशा चालू स्थिति में झूलती रहेगी। ये ऐसा लाख का घर सिद्ध होगा जिससे निकालने को इस बार विदुर कोई चूहा नही भेज सकेंगे, आपसी मनमुटाव की

नोटबन्दी से काबू आया नक्सलवाद एक झूठ-5

बीएसएफ का स्थानीय आदिवासीयों पर अत्याचार इस सशस्त्र आंदोलन के लिए आग में घी का काम करते हैं, जब यही आदिवासी स्वयं पर हुए अत्याचार की एफआईआर लिखाने थाने जाते हैं तो पुलिस इनकी शिकायत सुनती ही नही, लिहाज़ा इनका आखरी सहारा इनकी अपनी सरकार ही बनती है, अपने ही भटके हुए भाईयों के दमन के लिए उनकी बहु बेटियों पर अत्याचार सिवाय बदले की भावना को भड़काने के और कोई समाधान लेकर सामने नही आता। यह झड़प कभी खत्म नही होगी, यह सोचना ग़लत है कि नक्सल आंदोलन ख़त्म हो गया है, इस आंदोलन की ताक़त सरकारी भ्रष्टाचार और आर्थिक असमानता है। जिन कारणों के चलते नक्सल आंदोलन आगे बढ़ा है वो आज भी मौजूद हैं। धन व्यवस्था के लिए नक्सलियों तथा माओवादियों जो आज की तारीख में लगभग एक ही हो चुके हैं, उनका कारोबार पूर्ववत् ही चल रहा है, छत्तीसगढ़, बस्तर के सात जिलों में सरकार भी यह स्वीकार करती है कि माओवादी अपनी समानान्तर सरकार चला रहे हैं, नेता और सरकारी अफ़सरों से लेकर तेंदू-पत्ता और खनिज व्यापारी तथा अलग-अलग तरह के ठेकेदार अपने काम के एवज़ में माओवादियों को पैसा देते हैं, यह रकम करोड़ों में होती है। इस वसूली को लेवी कहा जाता है, माओवादियों की सरकार का राशन-पानी, दवा-दारू, गोला-बारुद और तमाम तरह के खर्चों का इंतजाम लेवी के रूप में वसूले गये करोड़ों रुपये से होता है। मई 2016 लोकसभा में एक शोध के हवाले से सरकार ने दावा किया था कि देश भर में माओवादी 140 करोड़ रुपये की लेवी वसूलते

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